आजादी के 7 दशक बाद भी प्यासा है पचंडा गांव, नदी के ‘चूआं’ से बुझ रही 500 लोगों की प्यास

विष्णु गुप्ता:

बड़कागांव: प्रखंड मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर आंगों पंचायत का पचंडा गांव आज के आधुनिक युग में भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। करीब 100 घरों और 500 की आबादी वाले इस गांव में पेयजल संकट इतना गहरा है कि महिलाओं को तपती धूप में नदी किनारे ‘चूआं’ (गड्ढा) खोदकर पानी निकालना पड़ रहा है।

 

ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि पिछले 4-5 दशकों से वे हर गर्मी में इसी तरह बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते हैं। गांव की जल आपूर्ति की स्थिति वर्तमान में बेहद दयनीय है

समाजसेवी कोलेश्वर गंझु के प्रयास से गांव में दो चापाकल लगाए गए थे, लेकिन देखरेख के अभाव में वे पिछले 3 वर्षों से खराब पड़े हैं।

गांव के तीन टोलों (पिंडरा टोला, ऊपर टोला और बीच टोला) में एक-एक कुआं है। इनमें से बीच टोला का कुआं पूरी तरह सूखने के कगार पर है।

जब कुएं और चापाकल जवाब दे देते हैं, तो महिलाओं को मीलों दूर नदी की ओर रुख करना पड़ता है। वहां रेत खोदकर बनाए गए ‘चूआं’ से गंदा पानी छानकर पीने और खाना बनाने की मजबूरी है।

जागरूकता की कमी और प्रशासनिक अनदेखी

ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि जागरूकता की कमी के कारण वे अब तक इसकी विधिवत शिकायत नहीं कर पाए थे। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि गांव में पुल का निर्माण (कोलेश्वर गंझु के प्रयास से) शुरू होने से विकास की उम्मीद जगी है, लेकिन पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता पर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया।

“गर्मी आते ही हमारी मुसीबतें बढ़ जाती हैं। स्वच्छता एवं पेयजल विभाग को इस ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि हमें इस नारकीय जीवन से मुक्ति मिले।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया

मामले की गंभीरता को देखते हुए बड़कागांव बीडीओ जितेन्द्र कुमार मंडल ने सकारात्मक आश्वासन दिया है।

“पचंडा गांव में पेयजल की समस्या का मामला संज्ञान में आया है। जल्द ही पीएचईडी (PHED) विभाग की टीम को वहां भेजा जाएगा। यदि हैंडपंप खराब हैं, तो उन्हें तत्काल मरम्मत करवाकर चालू कराया जाएगा ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके।” जितेन्द्र कुमार मंडल, बीडीओ

Leave a Comment