विष्णु गुप्ता: बड़कागांव
हजारीबाग के बड़कागांव प्रखंड के अंतर्गत आने वाली विभिन्न पंचायतों में कोयला खनन कंपनियों के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। गोंदलपुरा, बादम, हरली और बड़कागांव पूर्वी क्षेत्र के रैयतों ने अपनी जमीन और अस्मिता बचाने के लिए अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। ‘कर्णपुरा बचाव संघर्ष समिति’ के नेतृत्व में ग्रामीणों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन किसी भी कीमत पर उद्योगपतियों के हवाले नहीं करेंगे।
ग्रामीणों का सबसे ज्यादा गुस्सा उन बिचौलियों पर है जो कंपनी के एजेंट बनकर गांवों में सक्रिय हैं। संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि कुछ लोग फर्जी रैयत बनकर और ग्रामीणों को गुमराह कर कंपनियों के साथ साठगांठ कर रहे हैं।

हाल ही में एनटीपीसी क्षेत्र में कुछ ‘फर्जी रैयतों’ को ग्रामीणों ने रंगे हाथों पकड़ा। खबरों के मुताबिक, विरोध के दौरान इन लोगों ने अपनी संलिप्तता स्वीकार की है, जिससे ग्रामीणों में और अधिक रोष व्याप्त है।
उपस्थित ग्रामीणो ने कहा कि जो लोग चोरी-छिपे कंपनी के दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं और माटी का सौदा कर रहे हैं, वे समाज के सबसे बड़े दुश्मन हैं।
समिति के कड़े फैसले
आंदोलन को धार देने के लिए संघर्ष समिति ने कई कड़े सामाजिक नियमों की घोषणा की है:
कंपनी के किसी भी प्रतिनिधि या दलाल का गांव में प्रवेश वर्जित होगा।

किसी भी प्रलोभन में आकर किसी भी कागज़ात पर हस्ताक्षर न करने की अपील की गई है।
जो व्यक्ति जमीन का सौदा करने में दलालों की मदद करेगा, उसे समाज से बेदखल
“ये लोग हमारे पूर्वजों की विरासत और आने वाली पीढ़ी का भविष्य कौड़ियों के दाम बेचने पर तुले हैं। अब आंखों पर पट्टी बांधकर बैठने का समय नहीं है।” — कर्णपुरा बचाव संघर्ष समिति अपनी मांगों को और मजबूती से प्रशासन तक पहुँचाने के लिए ग्रामीणों ने एक बड़ा निर्णय लिया है। 22 मई 2026 को हजारीबाग उपायुक्त (DC) कार्यालय के समक्ष विशाल एक दिवसीय धरना प्रदर्शन किया जाएगा।

एनटीपीसी (NTPC), अदानी (Adani), जेएसडब्ल्यू (JSW), एनएमडीसी (NMDC) और रुंगटा जैसी कंपनियों के कोयला खनन प्रोजेक्ट्स को तत्काल रद्द किया जाए।
कृषि योग्य भूमि और जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुरक्षित रहे।
वर्तमान में गोंदलपुरा, बादम, राउतपारा, अंबाजीत, बाबूपारा और हरली क्षेत्रों में माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। ग्रामीण एकजुट होकर रात-दिन पहरा दे रहे हैं। ग्रामीणों का एक ही नारा गूँज रहा है: “जल, जंगल, जमीन हमारी है, इसे बचाने की अब हमारी बारी है।”

