
जाने कब होगी भव्य जल यात्रा व शोभा यात्रा
अनूप सिंह

कांडी: प्रखंड के बलियारी गांव स्थित ठाकुरबाड़ी परिसर में आयोजित होने वाला श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ अब पूर्व निर्धारित तिथि पर नहीं होगा। गांव में हाल ही में दो लोगों के निधन के कारण लगे सूतक की वजह से महायज्ञ की तिथि में परिवर्तन किया गया है।
श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ समिति बलियारी द्वारा सर्वसम्मति से यज्ञकर्ता तपोमूर्ति संत श्री सुंदरराज (यतिराज) स्वामी जी महाराज द्वारा यज्ञ की नई तिथियों की घोषणा की गई है।

अब महायज्ञ का शुभारंभ 18 अप्रैल को भव्य जल यात्रा के साथ किया जाएगा। यह जल यात्रा गांव में धार्मिक वातावरण का संचार करेगी और पूरे आयोजन की शुरुआत का प्रतीक बनेगी। वहीं, 23 अप्रैल को पूर्णाहूति, संतगणों की विदाई के साथ महायज्ञ का समापन होगा।

इस दौरान विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, हवन-पूजन और अन्य वैदिक कार्यक्रम के साथ साथ प्रतिदिन दिन 2 बजे से संगीतमय प्रवचन और रात्रि 8 बजे से रामलीला का आयोजन संपन्न किए जाएंगे। महायज्ञ का आयोजन वाराणसी के प्रसिद्ध संत सुंदर राज यतिराज्वस्वामी जी महाराज के सानिध्य में किया जा रहा है।

यज्ञ के दौरान प्रतिदिन 2 बजे से बड़े संतो और प्रवचनकर्ताओं द्वारा श्रीमदभागवत और रामायण का प्रवचन किया जाएगा। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ श्रद्धालुओं के लिए प्रतिदिन भंडारा (सामूहिक भोजन) का भी आयोजन किया जाएगा। आयोजन समिति के अध्यक्ष आनंद प्रकाश दुबे उर्फ अन्नू दुबे ने बताया कि महायज्ञ की सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। समिति के सदस्य लगातार दिन-रात मेहनत कर आयोजन को सफल बनाने में जुटे हुए हैं। उन्होंने बताया कि गांव के पश्चिम टोला निवासी स्वर्गीय सीताराम दुबे की पत्नी सुमति कुंवर (96 वर्ष) तथा स्वर्गीय धनंजय दुबे की पत्नी विमला देवी (78 वर्ष) के निधन के कारण गांव में सूतक लग गया, जिसके चलते महायज्ञ की तिथि को आगे बढ़ाना आवश्यक हो गया। बलियारी गांव में करीब 36 वर्षों बाद लक्ष्मी नारायणाय महायज्ञ का भव्य आयोजित हो रहा है। इसे लेकर गांव के सभी अभिभावकगण एवं ग्रामवासियों में काफी उत्साह और श्रद्धा का माहौल है। गांव के सभी परिवार इस आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और तैयारियों में सहयोग कर रहे हैं। समिति के अनुसार, जल यात्रा से लेकर पूर्णाहुति तक गांव के सभी घरों के लोग पूजा-अर्चना, धार्मिक फेरी और अन्य कार्यक्रमों में भाग ले सकेंगे। इस महायज्ञ को गांव की एकता, आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक माना जा रहा है।



